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AAO HAM MOHARRAM MANAYEN:आओ हम मुहर्रम मनायें.

 

इस्लामी साल का पहला महीना '' मुहर्रम ''

भाषा, धर्म , मज़हब चाहे कोई भी हो साल में बारह महीने ही होते हैं. जिसे हमें अच्छी तरह याद रखनी चाहिए। आइये हम इन बारह महीनों के नाम को जानते हैं.

इस्लामी महीनों के नाम,

(01) मुहर्रम (02) सफर (03)रबीउल अव्वल (04)रबीउल आखिर (05)जमादिल अव्वल (06)जमादिल आखिर (07)रजब (08) शाबान (09) रमजान (10) शव्वाल (11)ज़ी क़ादा (12) ज़िल हिज्जा l इस्लामी साल माहे मुहर्रम से शुरू होकर ज़िल हिज्जा के महीने पर ख़त्म तो जाता है.

मुहर्रम को क्यों याद किया जाता है.

इस्लामी साल का अंतिम एवं पहले महीने को क़ुरबानी के महीनों के नाम से जाना जाता है. अंतिम महीना ज़िल हिज्जा की दस तारिख को खुदा ने अपने बन्दे इब्राहीम से उसके  बेटे इस्माइल की क़ुरबानी का इम्तेहान लिया था जिसमे वो कामियाब हुए।  और पहले महीने मुहर्रम ही की दस तारिख को नवासे रसूल हज़रात इमामे हुसैन ने कर्बला के मैदान में अपने अहलो अयाल की क़ुरबानी पेश की थी।  इस लिए दोनों  महीनो को बड़े इहतेराम की नज़र से देखा  जाता है , 

माहे मुहर्रम की फ़ज़ीलत,

इस महीने को बड़ी अहमियत और फ़ज़ीलत हासिल है. हदीसे पाक (इस्लाम धर्म की बड़ी किताब ) में है की जो इंसान मुहर्रम के महीने की इज़्ज़तो अज़मत करेगा, अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त उसे जन्नत में इज़्ज़त अता फरमाएगा, और दोज़ख से निजात देगा.

मुहर्रम कैसे मनाएं,

जैसे ही मुहर्रम का चाँद निकले हम  मस्जिद में (अल्लाह के घर में )  एतेकाफ़ की नियत करके अल्लाह का मेहमान बन जायेंगे, क़ुरान शरीफ की तिलावत करेंगे नफिल नमाज़ पढ़ेंगे. ताकि आने वाला साल हमारे लिए बेहतर हो. और तमाम आफातो बलियात से मुसीबतो आलाम महफूज़ रहने की अल्लाह पाक से दुआए करेंगे. रात का हमारा यही अमल होना चाहिए.

हज़रत आयशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहो अन्हा फरमाती हैं कि जो शख्स नए साल मुहर्रम की पहली रात में शब् बेदारी करे और आठ रकत नमाज़ नफिल इस तरह पढ़े कि हर रकअत में सूरह फातेहा के बाद सूरह अख़्लास (कुल हो वल्लाहो अहद ) दस बार पढ़े तो मै क़यामत के दिन उसकी भी और उसके घरवालों की भी शफा अत करूंगी. अगर चे  उस पर दोज़ख की आग वाजिब हो चुकी हो.

पहला एवं अंतिम रोज़ा.

 पहली मुहर्रम का रोज़ा रखें, हदीसे पाक में है की जिसने मुहर्रम की पहली तारीख और  ज़िल हिज्जा  के आखरी तारिख का रोज़ा रक्खा,गोया कि उसने पिछले पूरे साल का रोज़ा रक्खा और आने वाले साल को रोज़ा ही से शुरू किया तो अल्लाह त आला उसके पच्चास साल के गुनाहों का उस रोज़ा को कफ़्फ़ारा बना देता है.

शाम में रोज़ा खोलने के समय अच्छे से अच्छा खाना बनाकर अपने बच्चों को खिलाएं ग़रीबों में तक़सीम करें और खूब ज़्यादा से ज़्यादा खर्च करें. इब्राहीन बिन मोहम्मद जो अपने ज़माने के बहुत बड़े बुज़ुर्ग थे फरमाते हैं कि जो शख्स आशूरा के दिन अपने घरवालों पर ज़्यादा से ज़्यादा खर्च करता है अल्लाह त आला पूरे साल उसको फराखि और वुस अत अता फरमाता है. वो कहते हैं कि हमने पच्चास सालों से इसका तज़र्बा किया है. और हमेशा रोज़ी में फराखि ही मयस्सर हुई है। 

यौमे आशूरह की अहमियत

आशूरह के दिन की बड़ी फ़ज़ीलत और अहमियत है. मुहर्रम की दस तारिख को आशूरह का दिन कहते है प्यारे नबी फरमाते हैं की उस दिन  अल्लाह पाक ने अपने दस नेक बन्दों अम्बियाए केराम (दूत) को बहुत बड़े इनआमात से नवाज़ा था इस लिए उसे आशूरा का दिन कहते हैं.

 और फिर किताबों में आया है कि आसमानो,ज़मीनों,पहाड़ों , और समन्दरों को  भी आशूरा के दिन ही पैदा किया गया. सब से पहली बारिश आशूरा की दिन ही हुई. आशूरा के दिन ग़ुस्ल करने,पत्थर का सुरमा अपनी आँखों में लगाने,यतीमो , ग़रीबो को खाना खिलने , और बीमारों के खैरियत पूछने की बड़ी अहमियत है.जिसने यह सब किया गोया उसने एक दिन भी अल्लाह की ना फ़रमानी नहीं की। 

प्यारे नबी फरमाते हैं कि जिसने मुहर्रम की दस तारीख का रोज़ा रखा उसको दस हज़ार फरिश्तों,दस हज़ार शहीदों और दस हज़ार हज और उमरह करने वालों के बराबर सवाब दिया जाता है. और जिसने आशूरह के दिन किसी यतीम के सरपर हाथ फेरा तो अल्लाह ताआला उसके सर के बाल के बदले जन्नत में उसका दर्जा बलन्द करेगा. और जिसने आशूरह की शाम को किसी मोमिन का रोज़ा खुलवाया उसने अपने तरफ से तमाम उम्मते मोहम्मद का रोज़ा इफ्तार कराया और सारी  उम्मत का पेट भरा.

शहादत का दिन

आशूरे का दिन ही शहादत वाला दिन है.नवासे रसूल उनके अहलो अयाल मैदाने कर्बला में क़ुरबानी पेश करने वाला दिन है. उस दिन नेक आमाल ज़्यादा से ज़्यादा करनी चाहिए. ढोल, ताशे , बाजे , गाजे से बचना चाहिए. ग़लत रस्म और खुराफात से दूर रहनी चाहिये , और उस दिन कम से कम 70 बार इस दुआ को पढ़नी चाहिए.  (हसबो नल्लाहो  व नेमल वकील , नेमल मौला व नेमननसीर )


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